वादा ए वफ़ा का निभौं कैसे,
चाँद हूँ में तो दिन में नज़र आऊ कैसे
आँखो में बिखरा हुआ कोई पिछले पहर का ख्वाब हूँ मैं
पुकारे भी कोई तो अब इन आँखो में समाऊ कैसे
भरा है दिल की गहराई में जैसे कोई दर्द तनः सा सफ़र
अब तू ही बता दे की वेआरणो में अपनी महफ़ील साजऊ कैसे
जो देखती हैं निगाहे वोह ही तो सच नही होता सब
एह एतिहायात भी ज़रूरी है दिल की बात नज़रो से छलकाऊ कैसे
ग़ज़लों में आ रहे हैं आल्फ़ाज़ आज दर्द के,
अब तू ही बता दे की दिल को में बहलऊ कैसे!!

चाँद हूँ में तो दिन में नज़र आऊ कैसे ………….
bhut sundar hai rachna.
bhut khub